December 31, 2010

नव वर्ष

नव वर्ष के शुभ अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें। इस अवसर पर चंद पंक्तियाँ आप सभी के लिए :-
नव वर्ष आया है,
नया प्रभात लाया है। 
इक नई उमंगों के संग,
नई तरंगों के संग। 
इक नए वादों के संग,
नए इरादों के संग। 
नव वर्ष आया है,
नया प्रभात लाया है
इक नई आभा लिये,
नई आशा लिये
इक नया जोश लिये,
नया तेज लिये
नव वर्ष आया है,
नया प्रभात लाया है
                         - सत्यप्रकाश पाण्डेय

October 7, 2010

ऐ कॉमनवेल्थ तेरे प्यार में

कॉमनवेल्थ के चक्कर में आम जनता खासकर दिल्ली की जनता को जितनी परेशानी उठानी पड़ी है उसका हाल-ए-दिल बयां तो दिल्ली वासी ही कर सकते हैं, मैं भी इससे अछूता नहीं रहा इतनी परेशानी उठाने के बाद अब भारत को नंबर वन देखना ही हर नागरिक की हसरत है हाल-ए-दिल बयां कुछ इस तरह है:-

क्या-क्या नहीं सहा हमने,
ऐ कॉमनवेल्थ तेरे प्यार में
राशन भी महंगा हुआ,
पेट्रोल भी महंगा हुआ,
दूध और रसोई गई भी हुआ महंगा,
ऐ कॉमनवेल्थ तेरे प्यार में
क्या-क्या नहीं सहा हमने,
ऐ कॉमनवेल्थ तेरे प्यार में
ऑफिस का रास्ता बदला,
घंटों जाम में फंसा,
पार्किंग से भी किया समझौता,
ऐ कॉमनवेल्थ तेरे प्यार में
क्या-क्या नहीं सहा हमने,
ऐ कॉमनवेल्थ तेरे प्यार में
सुना है दर्शक नहीं आते,
तेरे इस महाखेल में,
इस घाटा पूर्ति का साधन
ना बन जाएँ हम,
फिर से सरकार के इस गेम में,
और क्या-क्या सहेंगे हम,
ऐ कॉमनवेल्थ तेरे प्यार में
क्या-क्या नहीं सहा हमने,
ऐ कॉमनवेल्थ तेरे प्यार में

September 28, 2010

ईदगाह कहानी समीक्षा / Eidgah Story Review / Eidgah Kahani Samiksha

     प्रेमचंद मेरे प्रिय कहानीकारों में से हैं, आज उनकी एक प्रसिद्ध कहानी 'ईदगाह' की समीक्षा आपके साथ साझा कर रहा हूँ 
    
     'बाल मनोविज्ञान' पर आधारित 'ईदगाह' कहानी प्रेमचंद की उत्कृष्ट रचना है। इसमें मानवीय संवेदना और जीवनगत मूल्यों के तथ्यों को जोड़ा गया है। ईदगाह कहानी मुसलमानों के पवित्र त्यौहार ईद पर आधारित है जो की शीर्षक से स्पष्ट है। पवित्र माह रमज़ान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आने पर मुसलमान परिवारों में विशेषकर बच्चों में त्यौहार का उत्साह बहुत अधिक प्रभावशाली दिखाई देता है। सभी छोटे-बड़े, गरीब-अमीर वर्ग-भावना से ऊपर उठकर धार्मिक प्रेम की गहरी समझ और सहानुभूति से भरपूर पूरे उत्साह में भरे हुए बड़े-बूढों के साथ-साथ बालकों का दल भी ईदगाह की ओर बढ़ रहा है। सभी बहुत प्रसन्न हैं। हामिद तो सबसे ज्यादा प्रसन्न है। वह चार-पाँच साल का ग़रीब सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। हामिद अब अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है। पहले जितना प्रसन्न भी रहता है।उस नन्हीं सी जान को तो यही बताया गया है कि उसके अब्बा जान रुपये कमाने गए हैं और अम्मी जान अल्लाह मियां के घर से बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गईं हैं। इसीलिए हामिद कि प्रसन्नता में कोई कमी नहीं है और हो भी क्यों? आशा तो बड़ी चीज है और वो भी बच्चों की आशा, इनकी तो बात ही ना करिए। इनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती हैं।
     हामिद के मित्रों के पास में खर्च करने के लिए पैसे ही पैसे हैं परन्तु खुद हामिद के पास सिर्फ 6 पैसे हैं। आकर्षण के कई स्थान हैं , आकाश की सैर कराने वाला हिडौला, चरखी और अनेक प्रकार के मनभावक खिलौने बच्चों को अपनी तरफ खींच रहे हैं
     मेले में बच्चे खूब खरीददारी कर रहे हैं, मिठाइयाँ खा रहे हैं और मेले का आनंद उठा रहे हैं परन्तु हामिद कुछ चीजों के दाम पूछकर उनमें गुण-दोष विचार कर मेले में आगे बढता रहता है और यही लेखक दिखाना चाहता है की किस प्रकार हामिद जैसों का वर्ग जो अपनी वास्तविक स्थिति को जानते हुए अपने सीमित साधनों से सही मार्ग चुनकर अपने समाज का निर्माण करता है
     हामिद बहुत जागरूक व्यक्तित्व वाला लड़का है, वह जनता है कि उसकी दादी को चिमटे कि बहुत जरुरत है इसीलिए वह मेले में फ़िज़ूल खर्च ना करके चिमटा लेना उचित समझता है। हामिद जब चिमटा लेकर आता है तो उसकी दादी बहुत गुस्सा होती हैं। तब हामिद अपराधी भाव से कहता है - "तुम्हारी अंगुलियाँ तवे से जल जाती थी; इसीलिए मैंने इसे ले लिया।"
     हामिद ने यहाँ पर बूढ़े हामिद का रोल निभाया है और बूढ़ी अमीना ने बालिका का रोल निभाया। वह रोने लगी और दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देने लगी। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस रस और स्वाद से भरा हुआ
हामिद अपनी उम्र के अनुसार एक आम बच्चे कि तरह भोला भी है जब बच्चों के बीच जिन्नात का प्रसंग छिड़ा तो हामिद बड़े आश्चर्य से पूछता है -"जिन्नात बहुत बड़े होते होंगे ना।" इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भोलापन भी उसके चरित्र कि एक विशेषता थी
     कहानीकार ने हामिद के चरित्र में वो सारी विशेषताएं भर दी हैं जो एक मुख्य किरदार निभाने वाले के चरित्र में होनी चाहिए
     जहाँ तक मेरा विचार है हामिद कि उम्र 7 से 8 साल के बीच होनी चाहिए थी जो कि कहानीकार ने शायद भूलवश 4 से 5 साल कर दी है। मुझे नहीं लगता कि 4 से 5 साल का बालक इतना जागरूक हो सकता है
     कुल मिलाकर अंत में यही कहा जा सकता है कि कहानीकार ने आर्थिक विषमता के साथ-साथ जीवन के आधारभूत यथार्थ को हामिद के माध्यम से सहज भाषा में पाठक के दिलो-दिमाग पर अंकित करने की अद्वितीय कोशिश की है।          - सत्यप्रकाश पाण्डेय 

September 15, 2010

आरक्षण की राजनीति

     चुनाव के समय नेताओं द्वारा किये गए लोक लुभावन झूठे वादों के चलते एक बार फिर लोग सड़क पर उतरने को मजबूर हुए हैं।  सर्वविदित है की हरियाणा में जाट ओ.बी.सी. कोटे में शामिल होने के लिए हर संभव कोशिश में लगे हैं। जगह-जगह चक्का-जाम, तोड़फोड़ और आगज़नी की घटनाएँ हो रहीं हैं और वहाँ की पुलिस के पास लाचार और बेबस होकर इन सब कारनामों को देखने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है
     पहले तो पुलिस ने इन प्रदर्शनकारियों को रोकने की पुरजोर कोशिश की। इस कोशिश में एक प्रदर्शनकारी छात्र की मौत हो गई। प्रदर्शनकारी छात्र की मौत ने इन आरक्षण चाहने वालों की भावनाओं को भड़काने में 'आग में घी' का काम किया। प्रदर्शनकारियों ने ट्रेन, बैंक और पेट्रोल पम्प कुछ भी नहीं बख्शा। सेना के फ्लैग मार्च तथा सरकार के द्वारा किये गए समझौते के चलते मामला थोड़ा ठंडा हुआ। दो दिन से हो रहे इस प्रदर्शन को वहाँ की सरकार ने मिनटों में कैसे हल कर दिया ये तो सरकार ही जाने। प्रदर्शनकारियों और सरकार के बीच हुआ समझौता ज्यादा देर तक टिक नहीं पाया। प्रदर्शनकारी फिर सड़क पर आ गये। सबसे बड़ी बात ये है की जो लोग आरक्षण को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन करा रहे हैं वही लोग हरियाणा प्रदेश के ऐसे तबके से ताल्लुक रखते हैं जो आरक्षण की सीमा से ऊपर हैं पर सिर्फ़ नेताओं के वोटों की राजनीति के चलते इन प्रदर्शनकारियों का हौसला बढ़ा है
     आरक्षण की राजनीति फिर से गरम हो रही है और ये मसला हरियाणा सरकार के हाथ से फिसलता हुआ नज़र आ रहा है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए भी एक और मुसीबत खड़ी होती नज़र आ रही है। क्योंकि प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांग ना पूरी होने की स्थिति में कॉमनवेल्थ गेम्स में खलल डालने की धमकी दी है एक समय था जब भारत में जातिगत आरक्षण लागू कर के सभी लोगों को एक लेबल में लाना जरुरी हो गया था। पर अब जातिगत आरक्षण की कोई जरुरत नहीं रह गई है। जातिगत आरक्षण अब सिर्फ़ राजनितिक दलों का पासा बन कर रह गया है। जिसको नेता चुनाव के समय धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं। इसलिए सरकार को सभी जाति आधारित आरक्षण रद्द कर देने चाहिए

August 31, 2010

अकेला या अकेली

     बहुत दिन से दिल में इच्छा हो रही थी की मैं भी अपने विचारों को लोगों तक पहुचाऊं। इसके लिए मैं एक अच्छे मंच की तलाश में था। मेरे एक मित्र ने मुझे ब्लॉग लेखन का सुझाव दिया और अपने ब्लॉग का पता भी दिया। मित्र के ब्लॉग को देखने के बाद मुझे मेरी मंजिल दिखाई देने लगी। जरिया तो मुझे मिल गया अब बारी थी उसको एक पहचान देने की। मेरे मित्रों ने भी मुझे बहुत से सुझाव दिए। अंततोगत्वा ब्लॉग को पहचान के तौर पर अकेला कलम नाम मिला। चूँकि मैं 'राम की नगरी' से संबंध रखता हूँ, जहाँ बच्चों को व्याकरण की दृष्टी से शुद्ध हिन्दी का ज्ञान विरासत में मिलता है। आगे की शिक्षा-दीक्षा भी मैंने हिन्दी में विशेष दक्षता से पूरी की। इन सब कारणों से मुझे अकेला कलम नाम स्वीकार करने में असहजता महसूस होने लगी थी। मेरे गुरु जी ने भी इसको व्याकरण की दृष्टी से गलत ठहराया। अकेला कलम की एक सच्चाई यह भी है की मैंने इसको मिटा दिया था और अपने नाम से एक नए ब्लॉग (Satya`s Blog) को पहचान दी। फिर क्या था अकेला कलम की उलझन तो दूर हो गई। परन्तु अब ये अकेला कलम मैं और मेरे मित्रों के बीच बहस का मुद्दा बन गया। कुछ पक्ष में थे तो कुछ इसके विपक्ष में। इस बहस का हल ये निकला की मैं त्रुटि को नजरंदाज करके अकेला कलम को वापस ले आया। धीरे-धीरे अकेला कलम की आदत सी होने लगी। मेरे कुछ स्वजन समय-समय पर मेरी इस त्रुटि को ताजगी प्रदान करते रहे हैं। हाल ही में राजेश उत्साही जी तथा अख्तर खान अकेला साहब ने भी मेरा ध्यान इस त्रुटि की ओर आकृष्ट करने की खुबसूरत पहल की। जिनका मैं तहे-दिल से शुक्रगुजार हूँ।
     अब मैं इस प्रकरण पर आप सब को आदरणीय मानते हुए यह चाहता हूँ की आप सभी लोग मेरी सहायता करें। आप सभी के बहुमूल्य विचारों को मैं सर्वोपरि मानकर अनुसरण करूँगा। इस ब्लॉग का नाम अकेला कलम (जो की व्याकरण की दृष्टी से सही नहीं है) ही होना चाहिए या फिर अकेली कलम होना चाहिए। मैंने आप सब को अपना मानकर दिल की बात आप सब के सामने पेश कर दी। अब आप अपने विचारों के माध्यम से मुझे इस प्रकरण का हल निकालने में मेरी सहायता करें। 
धन्यवाद सहित। 
- सत्यप्रकाश पाण्डेय




August 26, 2010

पुनरागमन

वर्षों से दबा हुआ , 
एक जीवित , 
मृत व्यक्ति , 
उठ खड़ा हुआ, 
वह आज , 
कर रहा था , 
वर्षों से अपनी , 
चेतना का विकास । 
परिपक्व हो उठा , 
नहीं जरुरत उसको , 
किसी के मार्गदर्शन की , 
करके प्रण वह , 
जीवित व्यक्ति हो 
उठा है , पुनः जीवित , 
अबकी कर देगा 
तहस - नहस , उन लोगों को 
जिसने , जीते जी 
कर दिया , उसको 
मृत सदृश ।

August 13, 2010

आजादी स्पेशल

     मुबारक हो हम आजादी की 63वीं वर्षगाँठ  मनाने जा रहे हैं। टेलीवीजन के सभी चैनल अपनी टी. आर. पी. बढ़ाने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रम दिखाने को बेताब हैं। 15 अगस्त के दिन कोई भी चैनल नहीं चाहता कि उसके दर्शक किसी दूसरे चैनल पर फिसलें। स्कूलों में तरह-तरह के रंगारंग कार्यक्रम होंगे। कालेजों में ये दिन प्रेमी-युगलों के लिए सौगात लायेगा। बाजारों में विशेष ऑफर चल रहे हैं लेकिन सिर्फ़ 15 अगस्त तक ही। आजकल सड़कों कि लाल बत्तियों पर पवित्र तिरंगा लिए वो लोग मिलेंगे जिनको सरकार कॉमनवेल्थ के दौरान विदेशी मेहमानों को दिखाना भी नहीं चाहती। हमारे ये ग़रीब भाई इन दिनों पवित्र तिरंगा बेचकर अपना पेट भरेंगे। इन ग़रीबों के लिए तो 15 अगस्त का मतलब सिर्फ़ उन अच्छे दिनों से है जब ये आराम से अपना पेट भर पाते हैं। कहने को तो हम 1947 में ही आजाद हो गए। आजादी के बाद हमें मिला लूट, बेईमानी, भ्रष्टाचार और भी ना जाने क्या-क्या सौगात में मिला
     इस  समय देश में कोई भी ऐसा महकमा नहीं है जहाँ हम सिर्फ़ और सिर्फ़ ईमानदारी कि बात कर सकें। आज हमारा देश हर तरफ से दुश्मनों से घिरा है। भारत का सिरमौर कहे जाने वाले कश्मीर में अलगाववादी सक्रिय हैं। थोड़ा और आगे बढ़ें तो और भी बब्बर आतंकी मिलेंगे। इस तकनीकी युग में जहाँ एक तरफ बहुत तेजी से पश्चिमीकरण हो रहा है वहीं पंच परमेश्वर के ऊपर कोई भी बदलाव नज़र नहीं आ रहा। मध्य भारत का गुंडा राज किसी से छिपा नहीं है। पूर्वी भाग में तो उल्फा के साथ-साथ बड़े पैमाने पर मँहगी जंगली लकड़ियों और विलुप्त होते जानवरों के तस्करों का राज कायम है। पश्चिम को देखें तो जातिगत और क्षेत्रगत समीकरण नहीं बन पा रहे हैं। यहाँ लोगों को देश से नहीं अलग राज्य से मतलब है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में मावोवादी अपनी पकड़ मजबूत बनाने में लगे हैं। नेता खुलेआम इनके समर्थन में सड़कों पर आ गए हैं। मँहगाई दर हर हफ्ते ऊपर नीचे हो रही है। ये मँहगाई तो सरकार के संभाले नहीं संभलती। इतना सब कुछ होने के बाद भी हम सब कुछ भुला कर आजादी मनायेंगे
     हम भले ही 15 अगस्त को लाल किला की प्राचीर पर प्रधानमंत्री को तिरंगा फहराते ना देखें पर चैनलों पर ऐक्टरों को नाचते हुए जरुर देखेंगे। इंडिया गेट पर जाकर शहीदों को नमन भले ही ना करें पर बाजार जा कर जेबें जरुर ढ़ीली करेंगे। जिनके दिलों में थोड़ा बहुत देशभक्ति किसी कोने में बची है वो 15 अगस्त को 2-4 देशभक्ति गीत चला देंगे। तो इस तरह आप सभी को जश्न-ए-आजादी कि हार्दिक शुभकामनाएँ
सारे जहाँ से अच्छा, भारत देश है मेरा

August 4, 2010

कॉमनवेल्थ गेम्स : संक्षिप्त रिपोर्ट

     कॉमनवेल्थ की बयार इतनी तेज चल रही है कि इसमें सभी अपनी - अपनी पतंगे उड़ाना चाहते हैं। आयोजकों को तिजोरियां भरने का सुनहरा मौका मिला, सरकार को मंहगाई बढ़ाने का मौका मिला और विपक्षी पार्टियों को नमक - मसाला लगा मुद्दा मिला। सभी अपनी - अपनी पतंगे इस तेज हवा में उड़ाना चाहते हैं। गरीबों के दुःख में तो कॉमनवेल्थ ने आग में घी का काम किया। किसी ने सच ही कहा है -
अंधेर नगरी चौपट राजा
टका शेर भाजी टका शेर खाजा
     दीपक के बुझने से पहले लौ तेज हो जाती है उसी तरह इस हवा के बंद होने कि उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है और कॉमनवेल्थ को लेकर हर तरह का हो-हल्ला मचा है। एक दुसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप भी अपने चरम पर है। दिल्ली को हर कोने से चाक-चौबंद किया जा रहा है पर तैयारियों को देखकर तो ऐसा लग रहा है कि जैसे तैयारी के नाम पर झाड़ू-पोछा लगाया जा रहा हो। इस झाड़ू-पोछे के लिए 440 मिलियन डॉलर का अनुमान लगाया गया था जो बढ़ते-बढ़ते 2.5 बिलियन डॉलर से भी ऊपर पहुँच गया। कहीं नई सड़कें धँस रहीं हैं तो कहीं टाईलें उखड़ रहीं हैं। स्टेडियमों को चाक-चौबंद करने के लिए 150 करोड़ का अनुमान था जो बढ़कर 4000 करोड़ से भी ऊपर चला गया और स्टेडियम अभी भी दुरुस्त नहीं हो पायें हैं। दिल्ली सरकार तो अनुमान लगाने में फेल हो गई जिसका फल आम जनता को महंगाई के रूप में मिला। अगर कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत कि मटिया-पलीद हुई तो इसकी सारी जिम्मेदारी सरकार कि होगी। हमें अपनी मजबूती देखने के बाद ही ओखल में सिर देना चाहिए था। तैयारियों के खर्चे को लेकर सही अनुमान लगा होता तो शायद आम जनता को इतनी महंगाई ना झेलनी पड़ती। असली आंकड़ों के मुताबिक हम अभी उस लायक नहीं हुए हैं कि इतने बड़े आयोजन का जिम्मा ले सकें। ना जिम्मा लेते ना ही इसकी आड़ में बढ़ी महंगाई कि मार झेलते। सच तो ये है कि विकासशील देशों के लिए इतने बड़े आयोजन कभी भी फायदेमंद साबित नहीं हो सकते

July 22, 2010

बचपन के दिन

     बचपन के दिनों को याद करके मैंने दो साल पहले शब्दों के माध्यम से उस सुनहरे पल को इकठ्ठा करने की कोशिश की थी, और वो कोशिश आज पहली बार आप सब के सामने प्रस्तुत है:


याद आते हैं वो बचपन,
बड़ा तड़पाते है वो बचपन
वो माँ के गोद में लोरियां सुनना,
और सुनते ही रहना।
वो बारिश में भीगना,
और माँ का डाँटना।
याद आते हैं वो बचपन,
बड़ा तड़पाते हैं वो बचपन।
रेत के घरों को बनाना,
और गिरते हुए देखकर अफ़सोस 
जाताना - " उफ़ ! फिर गिर गया। "
कागज़ की नावों को बनाना,
और बारिश की बूंदों के बीच चलाना
डूबने पर फिर नई नाव बनाना
याद आते हैं वो बचपन,
बड़ा तड़पाते हैं  वो बचपन

July 15, 2010

ऑक्टोपस, फुटबॉल और आस्था

     स्पेन के फीफा विश्वकप जीतने के साथ ही पॉल ऑक्टोपस के समर्थकों में भारी इज़ाफा हुआ है और साथ ही आस्था की आड़ में अंधविश्वास को बढावा देने वालों को मजबूती भी मिली है क्योंकि अंधविश्वास तो आस्था की पराकाष्ठा से ही पैदा होता है। ऑक्टोपस की भविष्यवाणी के साथ ही एक बार फिर पूरे विश्व में भविष्यवाणी की चर्चा गर्म हो गई है। क्या सच में भविष्यवाणी नाम की कोई चीज़ होती है? आजकल सबके मन में यह प्रश्न उथल-पुथल मचाये हुए है। ऑक्टोपस बाबा ने जर्मनी के हार की भविष्यवाणी क्या कर दी पूरे विश्व में यह बात बहस का मुद्दा बन गई। जहाँ कभी इस बाबा की जय-जयकार होती थी वहीँ आज आलम ये है की स्पेन के समर्थकों को छोड़कर बाकी टीमों के समर्थकों के कारण इस बाबा की जान पर बन आई है। खेल से टोटकों और भविष्यवाणियों का रिश्ता तो बहुत पुराना है। क्रिकेट से लेकर फुटबॉल तक इसके उदहारण हैं। पुराने क्रिकेट खिलाड़ियों से लेकर वर्तमान फुटबाल  खिलाड़ी तक इससे अछूते नहीं हैं। क्या किसी टीम के हार का कारण सिर्फ़ इनकी काली पोशाक हो सकती है? नहीं ना। पर कुछ लोग ये सोच बना बैठे हैं। ख़ैर, ऑक्टोपस बाबा की महत्ता को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता, खासकर स्पेन समर्थकों की नज़रों में। स्पेन की जीत में बाबा का आशीर्वाद तो था ही पर फाइनल में स्पेन के खिलाडियों ने जो खेल दिखाया उसका तो कोई भी कायल हो जाये। जीत का श्रेय बाँटने में स्पेन के खिलाड़ियों को भुलाया नहीं जा सकता 

July 9, 2010

घाटी का मर्म

     घाटी का बवाल अभी शांत नहीं हुआ है। अमन बहाली के लिए सेना का फ्लैगमार्च जारी है। अलगाववादी ताकतें पकिस्तान के सह पर बवाल करने में कुछ हद तक कामयाब भी हुई हैं। इस बात को नाकारा नहीं जा सकता। घाटी में हो रहे इस बवाल का दोष हम वहाँ कि सरकार को नहीं दे सकते क्योंकि यह एक पूर्ण रूपेण सुनियोजित तथा सुनिश्चित दंगा है। वहाँ कि सरकार ने बहुत हद तक विकास के कार्य किये हैं पर वहाँ भी गरीबों कि कमी नहीं है। आज भी घाटी में कितने घर ऐसे हैं जिनको एक वक़्त के भोजन के लिए कई बार सोचना पड़ता है। ऐसे में कोई आकर उनको चार-पांच सौ रुपये देकर कहे कि तुम्हें सिर्फ पत्थर फेंकनें हैं तो वह ग़रीब सहर्ष इस ऑफर को स्वीकार कर लेगा। ग़रीबी उस आम इंसान को यह सोच पाने में विफल कर देती है कि जब वह पत्थर फेंकनें जायेगा तो शायद वापस भी ना आ सके  
      कश्मीर कि आम जनता कभी नहीं चाहती कि वहाँ कोई दंगा हो। वहाँ कि जनता शांति चाहती है। क्योंकि वहाँ कि जनता कई दशकों से इतने दंगे झेल चुकी है कि अब और दंगा बर्दास्त करने कि क्षमता नहीं बची है। वहाँ कि जनता को मज़हब के नाम पर भड़काकर तथा रुपयों का लालच देकर ज़बरन इस दंगे में धकेला जा रहा है। सरकार भी इस बात को अच्छी तरह जानती है। लेकिन घाटी में अमन बहाली के लिए सरकार सेना को आम जनता के पास ही भेजेगी। सेना का फ्लैगमार्च भी वहीँ होगा जहाँ घरों में चूल्हे नहीं जलते। दंगा फ़ैलाने वाले दिमाग़ सिर्फ 10 प्रतिशत ही हैं। लेकिन सारा नुकसान सारी परेशानी बेचारी ग़रीब जनता झेल रही है। जो 10 प्रतिशत लोग इस दंगे के कर्ता-धर्ता हैं उनको एक खरोंच भी नहीं आई होगी। ज़रा सोचिये वहाँ कि जनता कि ग़लती सिर्फ़ यही है कि वह आम जनता है। जिसका जन्म सिद्ध अधिकार सिर्फ़ दो पाटों के बीच में पिसना है   

स्वर्ग में नरक पार्ट-II

     स्वर्ग में नरक नामक शीर्षक में कल मैंने कुछ बातें लिखी, जो मुझे समझ में आई थीं। कुछ बंधुओं कि प्रतिक्रिया भी प्राप्त हुई। लेख में लिखी कुछ बातें मैं और साफ़ कर देना चाहता हूँ। मेरा व्यक्तिगत समर्थन घाटी कि गरीब जनता के प्रति है जो इतनी बेरोजगार है कि मात्र चार-पांच सौ रुपये में पत्थर फेकनें को तैयार हो जाते हैं। यह एक कटु सत्य है रही बात नक्सल कि तो आप सभी को मालूम होना चाहिए जबसे राष्ट्रपति शासन झारखण्ड में लागू हुआ है तब से कितने नक्सली पकड़े गए और कितने मारे गए। इनसे एक बात तो बिलकुल साफ़ नजर आती है कि कौन नक्सल का साथ दे रहा है तथा कौन अलगाव का।  

July 8, 2010

स्वर्ग में नरक

     फिर से घाटी में बवाल मचा हुआ है। अलगाववादी अपने मंसूबों में कामयाब हो रहे हैं। कश्मीर कि अवाम को भड़काया जा रहा है। जिसके चलते निर्दोष नागरिकों कि बेवजह मौतें हो रही हैं। जितनी बार किसी निर्दोष कि मौत हो रही है उतनी बार बवाल बढता जा रहा है। बवाल इतना बढ गया है कि शांति कि कोशिश बिफल होती जा रही है। आज हालात ये बन गए हैं कि घाटी को सेना के हवाले कर दिया गया। पर क्या कश्मीर को सेना के हवाले कर देने से मसला हल हो जायेगा। घाटी के अमन-चैन बहाल हो जायेंगे? देखते ही लोगों को गोली मारने का आदेश दे दिया गया है। मीडिया के कैमरे जब्त कर लिए गए हैं। इसका तो यही मतलब है अगर जिन्दगी से प्यार है तो शांत हो कर अपने घरों में रहो या फिर जान प्यारी नहीं है तो पेट कि आग बुझाने के लिए ना चाहते हुए भी बाहर प्रदर्शन का समर्थन करने निकलो और अपनी जान से हाथ धो बैठो। सरकार का कश्मीर को सेना के हवाले करने से शायद वहाँ अमन बहाली हो जाये पर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कश्मीर के प्रति भारत कि दलीलों का क्या होगा? अमन कि बहाली के लिए अपने ही लोगों को सेना के हवाले किया जा रहा है जो निश्चित तौर पर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत कि छवि को धूमिल करेगा

July 7, 2010

वो चेहरा

शाम का वक़्त था,
बस में जा रहा था मैं,
सहसा...
एक चेहरा ,
बन गया मेरे लिए,
कौतुहल का विषय,
लगा देखने मैं,
अन्य चेहरों को,
समझ में आया यह,
किसी का पीला, तो
किसी का काला
पड़ गया है चेहरा,
रंग अज़ब-गज़ब के मिले
देखने को चेहरे में
तब...
अनायास, हुआ सोचने को मजबूर,
कि, आदमी है कठपुतली
और समाज का ही एक वर्ग,
है इनको नचाने वाला
इसीलिए...
रंग-बिरंगे से लगते हैं चेहरे

January 28, 2010

बिडम्बना

         हम भारतीयों ने २६/११ की एक बरसी भी मना ली और दूसरी मानाने की तरफ अग्रसर भी हैं I मौका-ए-वारदात पर सुबूतों के साथ पकड़ा गया एक मात्र जीवित पाकिस्तानी आतंकवादी जिसके ऊपर मुकदमा चल रहा है I सुबूतों के साथ पकड़े जाने के बाद भी हमारी महान न्यायपालिका को अब जाकर पता चला है की उस आतंकवादी के खिलाफ पुख्ता सुबूत हैभारतीयों के करोड़ो रुपये उस आतंकवादी पर सिर्फ इसलिए खर्च किये गए की यह पता चल सके की वह गुनाहगार है I वह आतंकवादी जो कई भारतीयों के मृत्यु के साथ ही कई अतिथिगणों , जो हमारे महान देश की यात्रा पर आये थे और बदकिस्मती से उनकी आखिरी यात्रा हो गई ,की मृत्यु का भी जिम्मेदार है फिर भी हमारी महान न्यायपालिका ने उस आतंकवादी के खिलाफ सुबूत इक्कठा करने में करोड़ो रुपये खर्चे और साथ ही अनगिनत साँसें भी उस आतंकवादी को उपहार स्वरुप प्रदान की I
          हमारी महान न्यायपालिका को इस बात का एहसास नहीं है की जितनी बार भी हम भारतीय और साथ ही उन विदेशी मेहमानों के परिवारजन इस खौफ़नाक मंजर को याद करते हैं  उतनी बार हमारी आँखें ना चाहते हुए भी नम हो जाती हैं, और इस तरह से हमारी ही महान न्यायपालिका हम भारतीयों की भावनाओं से खेल रही है I ये खेल कब तक चलेगा कुछ पता नहीं I हाँ , अगर हम अपनी लचीली कानून व्यवस्था को देखें तो यह कहना गलत ना होगा कि - शायद इस मुक़दमे से सम्बंधित ख़बरें हमारी अगली पीढ़ी भी सुने और तब तक शायद कुछ और पुख्ता सुबूत भी हमारी महान न्यायपालिका को मिल जाये I

January 18, 2010

गार्ड

'गार्ड ' नाम सुनते ही ,
आने लगता है नज़र ,
एक सुन्दर पोशाक
पहना हुआ वह व्यक्ति ,
जो खड़ा होता है
प्रवेश द्वारों पर , परिवार
के भरण - पोषण के लिए ,
सज - धज कर ।
शायद ,
इस फूल पर ,
नहीं पड़ी निगाह ,
किसी कांटे की ,
हुआ भी अच्छा ही ।
नहीं पड़ी निगाह
किसी कांटे की
वरना ........
बन जाता खतरा ,
इस तबके के
बचे - खुचे अस्तित्व पर ।
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