September 15, 2010

आरक्षण की राजनीति

     चुनाव के समय नेताओं द्वारा किये गए लोक लुभावन झूठे वादों के चलते एक बार फिर लोग सड़क पर उतरने को मजबूर हुए हैं।  सर्वविदित है की हरियाणा में जाट ओ.बी.सी. कोटे में शामिल होने के लिए हर संभव कोशिश में लगे हैं। जगह-जगह चक्का-जाम, तोड़फोड़ और आगज़नी की घटनाएँ हो रहीं हैं और वहाँ की पुलिस के पास लाचार और बेबस होकर इन सब कारनामों को देखने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है
     पहले तो पुलिस ने इन प्रदर्शनकारियों को रोकने की पुरजोर कोशिश की। इस कोशिश में एक प्रदर्शनकारी छात्र की मौत हो गई। प्रदर्शनकारी छात्र की मौत ने इन आरक्षण चाहने वालों की भावनाओं को भड़काने में 'आग में घी' का काम किया। प्रदर्शनकारियों ने ट्रेन, बैंक और पेट्रोल पम्प कुछ भी नहीं बख्शा। सेना के फ्लैग मार्च तथा सरकार के द्वारा किये गए समझौते के चलते मामला थोड़ा ठंडा हुआ। दो दिन से हो रहे इस प्रदर्शन को वहाँ की सरकार ने मिनटों में कैसे हल कर दिया ये तो सरकार ही जाने। प्रदर्शनकारियों और सरकार के बीच हुआ समझौता ज्यादा देर तक टिक नहीं पाया। प्रदर्शनकारी फिर सड़क पर आ गये। सबसे बड़ी बात ये है की जो लोग आरक्षण को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन करा रहे हैं वही लोग हरियाणा प्रदेश के ऐसे तबके से ताल्लुक रखते हैं जो आरक्षण की सीमा से ऊपर हैं पर सिर्फ़ नेताओं के वोटों की राजनीति के चलते इन प्रदर्शनकारियों का हौसला बढ़ा है
     आरक्षण की राजनीति फिर से गरम हो रही है और ये मसला हरियाणा सरकार के हाथ से फिसलता हुआ नज़र आ रहा है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए भी एक और मुसीबत खड़ी होती नज़र आ रही है। क्योंकि प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांग ना पूरी होने की स्थिति में कॉमनवेल्थ गेम्स में खलल डालने की धमकी दी है एक समय था जब भारत में जातिगत आरक्षण लागू कर के सभी लोगों को एक लेबल में लाना जरुरी हो गया था। पर अब जातिगत आरक्षण की कोई जरुरत नहीं रह गई है। जातिगत आरक्षण अब सिर्फ़ राजनितिक दलों का पासा बन कर रह गया है। जिसको नेता चुनाव के समय धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं। इसलिए सरकार को सभी जाति आधारित आरक्षण रद्द कर देने चाहिए

41 comments:

  1. पता नहीं देश अभी और कितना बटेगा।

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  2. aarakshan ko nahi sirf yogyta ko mahatv dena chahiye.har field me keval yogya candidate hi lene chahiye.....satyaprakash ji aapne bahut achcha likha hai.

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  3. जब भी ऎसे प्रदर्शन हो तो पुलिस को चाहिये कि सब से पहले उन उल्लू के पट्टे नेताओ को आगे करे जिन्होने झुठे वादे किये होते है,

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  4. आपने सच कहा जातिगत आरक्षण अब खत्म हो जाना चाहिए...अब आरक्षण नेताओं का खेल हो गया है जिसमें गरीब जनता पिसती है...
    नीरज

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  5. ...aag lagaane vaalon aur ghee daalane vaalon par ankush laganaa aavashyak ho gayaa hai !!!

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  6. आरक्षण हमारे देश की दुखती राग बन गयी है . ये हनुमान की पूछ बन गई है , जितना आग लगाओ बढ़ती ही जा रही है . हनुमान की पूछ ने लंका जला डाली थी अब भारत की बारी है .

    अभी जातिगत जनगणना के आकडे आने वाले है तब देखिएगा , एक महाभारत और शुरू होगा जिसमे कोई पांडव नहीं होगा बल्कि केवल कौरव ही होंगे .

    मै आपके लेख से सहमत हू , किसी भी तरह का आरक्षण तुरंत खतम होना चाहिए

    मृत्युंजय कुमार राय

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  7. आरक्षण नामक राक्षस को नेताओ ने ही पैदा किया है....वह दिन दूर नही जब यही राक्षस इन पर झपट पडेगा!
    ...मुझे बधाई देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

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  8. राजनीति में तो बस आग दिखाई देनी चाहिये कहीं भी अपनी रोटियां सेक लेते हैं ये तो...चाहे आग चिता ही की क्यों न हो.

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  9. सब कुछ तो सबने कह दिया अब मैं क्या कहूँ. लोग जो सार्वजानिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं उनको चाहिए की जिस नेता की गलती हो उसकी अगर!!!!!!! कोई अपनी समाप्ति हो तो उसे नुकसान पहुंचाएं

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  10. आपने सही मुद्दे को लेकर बहुत ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है! जातिगत आरक्षण का ख़त्म होना बेहद ज़रूरी है पर पता नहीं आखिर ये कब होगा! जितने भी नेता हैं सब धोकेबाज़ हैं और गलत तरीके से पैसे कमाने के बारे में सोचते हैं और बेचारे जनता कुछ कर नहीं पाते!

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  11. आरक्षण दलित को दिया जाना चाहिए पर दलित कौन है इसकी पुनर्व्याख्या की जानी चाहिए- जन्म के अनुसार नहीं बल्कि आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर

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  12. bilkul sahi kah aapne.....
    aarakshan ki aag ek jagah khatm nahi hoti ki doosari jagah lag jati hai.

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  13. आरक्षण तो हम में ज्यादा फूट डालने का काम कर रहा है । कहां तो अंबेडकर जी ने सोचा था कि वह आरक्षण से सबको एक सा बना देंगे ।

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  14. आदरणीय श्री सत्य प्रकाश पाण्डेय जी,
    नमस्कार।

    आपने मेरे ब्लॉग पर दस्तक दी और अत्यधिक छोटी टिप्पणी देकर, मुझे आपके ब्लॉग के दर्शन करवाये। इसके लिये मैं आपका आभारी हूँ।
    मैं सम्भवत: आपसे पहली बार मुखातिब हूँ। आपके लेख के पक्ष में लिखना तो सम्भव है ही नहीं और विरोध में लिखूँगा तो न जाने कितने जुमलों से नवाजा जा सकता हूँ!

    इस सबके उपरान्त भी यही कहना चाहूँगा कि मेरा मानना है कि संविधान एवं भारत की स्वतन्त्रता से सम्बन्धित विषयों पर लिखने से पूर्व, विषय की पूर्ण जानकारी प्राप्त करके लिखा जाये तो हम वर्तमान एवं आने वाली पीढियों को मार्गदर्शन दे सकते हैं।

    किसी विषय पर संविधान के विरुद्ध आलेख लिखकर, संविधान का ज्ञान नहीं रखने वाले पाठकों से समर्थन हासिल करके प्रसन्न होने से लेखकीय धर्म पूरा नहीं होता है!

    इच्छा तो विस्तृत टिप्पणी लिखने की है, लेकिन इससे पूर्व आपसे विनम्र निवेदन है कि कृपया आप अपने लेख के निम्न वाक्योंशों/निष्कर्षों के आधार, कारण और कानूनी प्रावधानों पर प्रकाश डालने का कष्ट करें :-

    1. सबसे बडी बात ये है कि जो लोग आरक्षण को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, वही लोग हरियाणा प्रदेश के ऐसे तबके से ताल्लुक रखते हैं, जो आरक्षण की सीमा से ऊपर हैं।

    -इस निष्कर्ष में आपका आरक्षण की सीमा से ऊपर से क्या मतलब है? यह बात पूरी तरह से अस्पष्ट है। आरक्षण से ऊपर की सीमा कौनसी है, किस कानून में और कब बनायी या निर्धारित की गयी थी?

    2. अब जातिगत आरक्षण की कोई जरूरत नहीं रह गयी है।

    -मेरी विनम्र जानकारी के अनुसार आजादी से पूर्व तो भारत में कुछ जातियों को जातिगत आरक्षण था, लेकिन आजादी के बाद से आज तक तो भारत का संविधान किसी भी जाति को जातिगत आधार पर आरक्षण नहीं देता है! फिर आप कौनसे जातिगत आरक्षण की बात कर रहे हैं? कृपया मार्गदर्शन करें।

    आदरणीय श्री पाण्डेय जी आपसे निवेदन है कि आप पाण्डेय (ब्राह्मण) जी बनकर नहीं, बल्कि इस देश के सच्चे, निष्पक्ष एवं जागरूक नागरिक की हैसियत से उपरोक्त दो बिन्दुओं पर विचार/जानकारी प्रदान करें। जिससे हम जैसे लोगों को भी कुछ लिखने का अवसर मिल सके।

    एक और निवेदन मुझे आपके उक्त उधृरित वाक्य टाईप करने पडे हैं, क्योंकि आपके ब्लॉग पर सलेक्ट करके कॉपी करने की सुविधा नहीं है, हो सकता है कि मुझे पर्याप्त तकनीकी ज्ञान नहीं हो। जो भी हो इस बारे में भी मार्गदर्शन करें।

    शुभकामनाओं सहित
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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  15. आदरणीय मैडम आशा जोगलेकर जी,
    नमस्कार।

    आपकी टिप्पणी के सम्बन्ध में इतना लिखना जरूरी समझता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर जी ने वर्तमान में प्रचलित आरक्षण न तो कभी नहीं मांगा था न हीं उन्होंने कभी इसका समर्थन किया था, बल्कि वे इसे कटु आलोखक एवं विरोधी भी थे। इसलिये डॉ. अम्बेडकर जी के नाम से अपने किसी विचार को सही सिद्ध करना मेरी नजर में बौद्धिक अपराध है।

    आदरणीय आशा जी यह कटु सत्य लिखने के लिये आप ही ने मजबूर किया है।

    शुभकामनाओं सहित
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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  16. Shat pratishat sahamat .....ek sahi mudde ke sath bhadiya aalekha likha aapane !
    ek nanhi blogger aapko bula rahi hai yahan
    अनुष्का

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  17. ज्वलंत मुद्दा...कुछ ना कुछ तो करना ही पड़ेगा. अच्छी पोस्ट ...बधाई.
    ________________________________
    'शुक्रवार' में चर्चित चेहरे के तहत 'पाखी की दुनिया' की चर्चा...

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  18. aapke blog par pehli baar aana hua...
    aur aate hi mann maayus hua...
    blog ka title hi soch mein daal deta hai....
    kya aapko hindi ka gyan nahi ya jaan bujh kar iska apmaan kar rahe hain.....
    kalam akeli hoti hai akela nahi.....
    kya aapko iske ling ka dhyaan nahi......
    aur kisi ne bola bhi nahi aapko....
    aashcharya.....

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  19. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  20. मीणी जी ने कुछ सही प्रश्न उठाए हैं। पर मेरी समझ में नहीं आ रहा कि आरक्षण जाति के अधार पर ही नहीं अब तो धर्म के नाम पर भी मांगा जा रहा है। उस धर्म के नाम पर जिसमें सभी को बराबर समझा जाता है। आरक्षण का फायदा कितनी पीढ़ियों तक लोगो को मिलेगा ये भी तो तय होना चाहिए। हद तो तब होती है जब आगे बढ़ने की जगह पिछली जाति में लोग शामिल होना चाहते हैं।

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  21. ये कैसी राजनीती जो देश की जनता को एक सूत्र में नहीं पिरो रही .. बल्कि जातिवाद फैला रही है ऐसे आरक्षणों से .....आर्थिक स्तिथि पर आधारित मदद होनी चाहिए पर आरक्षण किसी भी पहलू में कतई नहीं...

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  22. वास्तविक जिन्दगी के संघर्ष और राजनीति के बीच के अंतर को लोग समझ चुके हैं। अब लोग भी ज्यादा फायदा उठाने के चक्कर में पक्ष और विपक्ष का खेल खेलने लगे हैं।

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  23. सहमत हूँ इस बात से ... आरक्षण का कोई फाय्दा नही हो रहा सिर्फ़ नेताओं की नेता गिरी बॅड रही है .... इसे ख़त्म करना ही उचित है ...

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  24. @ शेखर सुमन जी

    आदरणीय 'सुमन' जी नमस्कार,
    आप मेरे ब्लॉग पर आये अपनी बहुमूल्य टिप्पणियों से हमें नवाजा जिसका मैं शुक्रगुजार हूँ,
    मुझे खेद है की आप मेरे ब्लॉग पर आकर मायूस हो गए,
    'इंजीनियर' साहब मुझे आपसे ज्यादा तो हिन्दी का ज्ञान है नहीं फिर भी एक बात मैं आपको बहुत विनम्रता से बताना चाहता हूँ,
    'कलम' को लेकर शुरू से हिन्दी के विद्वानों में मतभेद रहा है,
    हिन्दी के इतिहास से पहले कभी आप रूबरू हुए होते तो ये प्रश्न नहीं उठाते,
    खैर, मैं आपको कुछ लिंक बता रहा हूँ जो आपके इस भ्रम को दूर करने में सहायक सिद्ध होगी,
    आप कृपया इन लेखों को जरुर पढ़ें:-
    कलम आपकी या आपका

    अकेला या अकेली

    शुभकामनाओं सहित
    सत्यप्रकाश पाण्डेय

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  25. @ "मीणा" जी,

    आदरणीय "मीणा" जी नमस्कार,

    आप मेरे ब्लॉग पर आये अपनी बहुमूल्य टिप्पणियों से हमें नवाजा जिसका मैं शुक्रगुजार हूँ।
    आपने मेरे दो वाक्यांशों पर विस्तृत जानकारी की इच्छा जताई थी जिसके लिए मैं आज आपके सामने प्रस्तुत हूँ,
    थोडा देर से आने के लिए खेद है।
    1. "आरक्षण की सीमा से ऊपर" से मेरा तात्पर्य ये है:-
    आरक्षण का सच्चा हक़दार वो है जो शारीरिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा है फिर चाहे वो 'मीणा' हो या 'पाण्डेय'।
    जितने लोग हरियाणा में पिछले दिनों प्रदर्शन कर रहे थे वे अगर शारीरिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े होते तो प्रदर्शन नहीं कर रहे होते,
    कहीं पर अपने शाम के भोजन के लिए मेहनत कर रहे होते।
    2. 'जातिगत आरक्षण की कोई जरुरत नहीं रह गई है' से मेरा तात्पर्य ये है:-
    इस वाक्यांश पर अपने प्रश्न में आपने कानून का सहारा लिया है,
    तो मैं आपको इसी भाषा में बताता हूँ।
    आपको शायद ये नहीं पता है की भारत देश में कानूनन कितने प्रकार के आरक्षण लागु हैं।
    मैं आपको बताता हूँ ताकि आप अपनी कुछ जानकारी बढ़ा सकें:-
    1. Caste based
    2. Management quota
    3. Gender based
    4. Religion based
    5. State of domiciles
    6. Undergraduate colleges
    7. Other criteria:-
    Some reservations are also made for:
    a. Sons/Daughters/Grandsons/Grand daughters of Freedom Fighters.
    b. Physically handicapped.
    c. Sports personalities.
    d. Non-Resident Indians (NRIs) have a small fracton of reserved seats in educational institutions. They have to pay more fees and pay in foreign currency (Note : NRI reservations were removed from IIT in 2003).
    e. Candidates sponsored by various organizations.
    f. Those who have served in the armed forces (ex-serviceman quota).
    g. Dependants of armed forces personnel killed in action.
    h. Repatriates.
    i. Those born from inter-caste marriages.
    j. Reservation in special schools of Government Undertakings /PSUs meant for the children of their employees (e.g. Army schools, PSU schools, etc.).
    k. Paid pathway reservations in places of worship (e.g. Tirupathi Balaji Temple, Tiruthani Murugan (Balaji) temple).
    l. Seat reservation for Senior citizens/ PH in Public Bus transport.


    आपके ही राजस्थान में चंद वर्ष पहले Other Backward Castes (OBCs) के भाई बंधु ने देशव्यापी प्रदर्शन किया था, वे सिर्फ Other Backward Castes (OBCs) के आरक्षण की बात कर रहे थे,
    ना की All Backward Castes (OBCs) के आरक्षण की।
    आपको महामहिम सर्वोच्च न्यायालय का फैसला भी बताता हूँ जो इस प्रदर्शन पर आया था,
    "April 2008
    On 10 April 2008, the Supreme Court of India upheld the law that provides for 27% reservation for Other Backward Castes (OBCs) in educational institutions supported by the Central government, while ruling that the creamy layer among the OBCs should be excluded from the quota."

    महामहिम सर्वोच्च न्यायालय के कुछ और फैसलों का लिंक भी भेज सकता हूँ जिससे आप पूरी तरह से सहमत हो जायेंगे की आजादी के बाद भारत वर्ष के कानून ने जातिगत आरक्षण को मान्यता दी है,
    अब आप मुझे बताइए की महामहिम सर्वोच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया उसमें (OBCs) की जगह (ABCs) क्यों नहीं है, या फिर जो प्रदर्शन कर रहे थे वो सिर्फ अपनी जाति के लिए प्रदर्शन कर रहे थे या सभी जातियों के लिए प्रदर्शन कर रहे थे?

    "मीणा" जी सिर्फ (OBCs) को ध्यान में रख कर टिप्पणी ना करिए निष्पक्ष होकर टिप्पणी और लेख लिखिए ताकि अगली पीढ़ी इस आरक्षण रूपी कोढ़ से मुक्त हो सके।

    "मीणा" जी मेरे ब्लॉग पर कॉपी कर के पेस्ट करने की सुविधा नहीं है इसलिए आपको मेरे वाक्यांशों को टाइप करना पड़ा जिसके लिए मुझे खेद है।

    शुभकामनाओं सहित
    सत्यप्रकाश पाण्डेय

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  26. आदरणीय श्री पाण्डेय जी,

    आपने मेरी टिप्पणी का प्रतिउत्तर दिया। जिसके लिये आपका आभार।

    आदरणीय श्री पाण्डेय जी, आपने अपनी टिप्पणी में मेरी जानकारी/ज्ञान बढाने की बात लिखी है, काश आपने ऐसा किया होता, तो मैं आपकी ॠणी होता?

    आदरणीय श्री पाण्डेय जी, मैंने आपसे दो बिन्दुओं पर जानकारी प्रदान करने का आग्रह करने के साथ-साथ निवेदन किया था कि कृपया अपने लेख के वाक्यांशों/निष्कर्षों के आधार, कारण और कानूनी प्रावधानों पर प्रकाश डालने का कष्ट करें।

    आदरणीय श्री पाण्डेय जी, आपने पहले बिन्दु में जो आधार गिनाये हैं, वे न तो संविधान सम्मत हैं और न हीं कानून सम्मत! हाँ जैसा आपने कहा है, वैसी आपकी व्यक्तिगत राय जरूर हो सकती है। या सरकार से आपकी मांग हो सकती है। इसलिये आपकी राय/मांग के अनुसार किसी भी आन्दोलनकारी समूह या वर्ग को आरक्षण की सीमा से ऊपर लिखना मुझे तो किसी भी दृष्टि से न तो नैतिक नजर आता है और न हीं कानून सम्मत! इस बारे में कहना जरूरी समझता हूँ कि हमारे देश के किसी भी कानून में कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है, जिसके आधार पर किसी जाति को आरक्षण की सीमा से ऊपर माना जाने का प्रावधान हो।

    आदरणीय श्री पाण्डेय जी, आपने दूसरे बिन्दु में तो ऐसी बात लिख दी, जिसकी कम से कम मैं तो कल्पना भी नहीं कर सकता था! आपने अपने विचारों को सुप्रीम कोर्ट के मुख में डाल दिया। कृपा करके मुझे एक भी ऐसा निर्णय किसी भी अदालत का बतलाने का कष्ट करें, जिसमें ओबीसी का मतलब अदर बैकवर्ड कास्ट हो। संविधान में और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में तथा मण्डल आयोग की रिपोर्ट में ओबीसी का मतलब है अदर बैकवर्ड क्लास। जहाँ आन्दालनकारियों द्वारा की जाने वाली मांग की बात हैं तो वह कोई कानूनी आधार नहीं है। इस देश में कोई खालिस्तान की मांग करता है तो इससे कानून या संविधान में खालिस्तान का अस्तित्व पैदा नहीं हो जाता है?

    आदरणीय श्री पाण्डेय जी, आपने सर्वोच्च न्यायालय के जिस कथित निर्णय का सहारा लिया है, उसका पूर्ण विवरण (साईटेशन) बतलाने का कष्ट करें, जहाँ पर आपके बताये अनुसार ओबीसी का मतलब अदर बेकवर्ड कास्ट लिखा हुआ है?

    आदरणीय श्री पाण्डेय जी, आपने मेरी भाषा में जवाब देने की बात कही है, लेकिन आदरणीय श्री पाण्डेय जी, यह मेरी भाषा नहीं है। मैं तो आपसे अपेक्षा कर रहा था कि वास्तव में आप कुछ ऐसी जानकारी देंगे, जिससे हमारा मार्गदर्शन होगा और आपके ब्लॉग पर लिखे वाक्यांश-सबकी आवाज-की व्यावहारिक प्रमाणिकता सिद्ध होगी।

    आदरणीय श्री पाण्डेय जी, आपने अनेक प्रकार के आरक्षणों की सूची गिनाई है, जिसमें पहला-कास्ट बेस-लिखना असंवैधानिक है। इस सूची में जितने भी आरक्षण गिनाये गये हैं, उनमें से एक भी जातिगत आरक्षण नहीं है और इन सबके बारे में मुझ पूर्व से जानकारी है।

    आदरणीय श्री पाण्डेय जी, मैं फिर से कह रहा हूँ कि संविधान में जातिगत आरक्षण की कोई व्यवस्था या प्रावधान नहीं है। इसलिये संविधान या न्यायालय के निर्णयों को पढे बिना या पढकर समझने की योग्यता हासिल किये बिना लिखे गये आलेख या टिप्पणियाँ-सबकी आवाज-कभी नहीं हो सकती और ऐसे व्यक्तिगत एवं पूर्वाग्रही विचार केवल पाठकों को मार्ग से भटकाने के अलावा कुछ भी नहीं करते। जिनके कारण समाज में वैमनस्यता पैदा होती है।

    आदरणीय श्री पाण्डेय जी, अन्त में एक बात और कि बहुत से अन्य लोगों की भांति लगता है कि आपको भी अजा एवं अजजा का आरक्षण जातिगत आरक्षण नजर आता है। आप चाहें तो आपको मैं सुप्रीम कोर्ट के एकाधिक ऐसे निर्णयों से अवगत करवा सकता हूँ, जिनमें साफ तौर पर कहा गया है कि हमारे देश में और देश के संविधान में जाति आधारित आरक्षण नहीं है।

    शुभाकांक्षी।
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश

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  27. सही कहा आपने...पूर्णतः सहमत हूँ...

    अंग्रेजों की निति को लेकर चलने वाले ये राजनेता देश को कहाँ ले जाकर पहुंचाएंगे ...पता नहीं ...जातिगत आरक्षण सीधे अन्याय है,उनपर जिन्हें सच मुच संरक्षण मिलना चाहिए...

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  28. पहले केवल आपका आलेख पढ़ा था...बाद में टिप्पणियां भी पढ़ीं...
    जानकारी बढ़ने के लिए बहुत बहुत आभार...
    कोई कुछ भी कह ले, कमजोर के संरक्षण का यह वर्तमान स्वरुप जायज नहीं हो सकता...
    देश के सभी नागरिकों को जिन्हें संरक्षण की आवश्यकता है,सारकार को सामान रूप से देनी चाहिए,पर आरक्षण के इस रूप के तहत नहीं...

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  29. aapka prashn bahut hi aham hai .mera bhi yahi manna hai yogyata ke aadhar par koi bhi nirniya hona chahiye .uchit likha aur sundar likha .

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  30. @डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश

    आदरणीय मीणा जी,
    नमस्कार,
    आपसे कुछ और कहना मेरे ख्याल से अब ठीक नहीं है क्योंकि बिना सिर-पैर की बातों का कोई अंत नहीं होता,
    और न ही मेरे पास इतना वक्त है, ब्लॉग लेखन मेरा शौक और खाली समय का सद उपयोग भर है। जिसमें मैं अपने विचारों को लिखता हूँ, आप मेरे विचारों से सहमत या असहमत होने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है।

    आप इसी बात से अंदाजा लगा लीजिये की इस लेख पर अपनी टिप्पणियों के माध्यम से कितने लोग पक्ष में है और कितने विपक्ष में।
    रही बात 'सबकी आवाज' की तो मेरे ख्याल से भारत में लोकतंत्र का राज है और लोकतंत्र का क्या अर्थ है ये तो आपको पता ही होगा।
    मेरी दो टूक बात यही है कि, मैं सिर्फ और सिर्फ शारीरिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण देने के पक्ष में हूँ, और इसके पक्ष में आपको छोड़कर बाकी 'सबकी आवाज' मुझे सुनाई दे रही है।

    किसी की कही एक बात मुझे याद आ रही है:- 'सोये हुए को सभी जगा सकते हैं पर जगे हुए को कौन जगाये।'
    खैर,
    आप ब्लॉग पर आये और अपने हिसाब से कई जानकारियां दीं, जिसके लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया !!

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  31. आपके ब्लॉग पर अच्छी चर्चा हुई है. आरक्षण पहले दिन से ही विवाद का विषय रहा है. सभी को अपना हित देखना है. सिद्धांतः और व्यक्तिशः. अब इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि टिकाऊ विकास के लिए टकाऊ समाज भी चाहिए. आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा. HTML का कम प्रयोग होने इसकी स्पीड बढ़ जाती है.

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  32. आदरणीय मेरा आशय स्वयं को सही या आपको गलत सिद्ध करना कदापि नहीं, बल्कि आपको एक बुद्धिजीवी मानकर सही बातों को सामने लाना भर है।

    मेरा मानना है कि बुद्धिजीवी हमेशा सत्य को स्वीकार करने के लिये तत्पर रहता है। इससे अधिक कुछ भी नहीं।

    वैसे हम आदिवासियों को ऐसी टिप्पणियाँ मिलती रहती हैं। जिनकी हमको आदत है।

    हाँ मैं इतना जरूर कहना चाहता हूँ कि आपके विचारों के समर्थक सोये हुए हो सकते हैं, मैं जागकर सोया हुआ नहीं हूँ।

    जिनके मनोमस्तिष्क पर ऐसे लोगों का प्रभाव हो, जो ओबीसी का मतलब अदर बैकवर्ड कास्ट समझाते हैं, उनकी हालत क्या होगी? ईश्वर सबकी रक्षा करें।

    धन्यवाद।
    शुभाकांक्षी।
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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  33. आदरणीय आप लिखते हैं कि
    "रही बात 'सबकी आवाज' की तो मेरे ख्याल से भारत में लोकतंत्र का राज है और लोकतंत्र का क्या अर्थ है ये तो आपको पता ही होगा।"

    मुझे लोकतन्त्र का यह मतलब भी ज्ञात है कि-

    "लोकतन्त्र में सिर गिने जाते हैं, सिर के अन्दर क्या है, ये नहीं देखा जाता है।"

    इसके उपरान्त भी लोकतन्त्र इसलिये जिन्दा है, क्योंकि लोकतन्त्र का वास्तविक अर्थ समझने वाले लोग अभी इस देश में जिन्दा हैं। अन्यथा तो रिश्वत लेने को कभी का बहुमत के आधार पर कानूनी अधिकार घोषित कर दिया गया होता।

    शुभाकांक्षी।
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश

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  34. मूल उद्देश्य कहीं बहुत पीछे छूट गया लगता है। यह विषबेल न जाने क्या-क्या अपनी चपेट में लेगा।

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  35. जातिगत आरक्षण के मैं भी खिलाफ हूं। आरक्षण की जगह आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए...जो काबिल है और आर्थिक तंगी के कारण कुछ कर नहीं कर पा रहा उसे आर्थिक सहायता देकर मौका देना चाहिए जिससे वह भी प्रयास कर सके। जातिगत आरक्षण देकर तो जातिवाद की खाई और गहरी होगी।...बहुत खलता है जब आपसे बहुत कम नम्बर पाकर कोई मेन में सेलेक्ट होता है और आप बाहर हो जाते हैं। मैं भी भुक्तभोगी हूं...सिविल सर्विसेज की मैरिट 815 गई थी मेरे 810 थे मैं बाहर थी और 610 वाला मेन में चयनित था...कहां 810 और कहां 610...बहुत बड़ा अंतर...खैर वह बात गई..न जाने कितने ही ऐसे हर साल महसूस करते होंगे और मन में फिर नफरत ही बढ़ती है...आपने बहुत अच्छा लिखा है...बधाई

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  36. ऊपर डॉ.मीणा और वीना जी के कथन के प्रति संवेदनशीलता आवश्यक है. पदोन्नति में जूनियर को आगे पाकर तकलीफ़ होती है है. इसी तरह जातिगत पूर्वाग्रहों का शिकार होने से भी पीड़ा होती है. लेकिन हमें ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए जिससे समाज आंदोलित हो. हमारा प्रयास होना चाहिए कि यह विकसित हो.

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  37. भाईसाहब.....

    मसला बहुत गम्भीर है
    कोई पक्ष में है और कोई विपक्ष में

    किंतु मूलभूत शिक्षा प्राप्ति के लिये आर्थि सहायता दी जानी चाहिये न कि किसी प्रतियोगी परिक्षाओं में आरक्षण .......


    आगे ज्ञानी जाने

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  38. सत्यप्रकाश जी मेरे ब्लॉग से जुड़ने के लिए आप मेरे दिल से के अनुसरणकर्ता बन सकते हैं....इसके लिए आपको http://madhuchaurasiajournalist.blogspot.com पर जाकर अनुरसणकर्ता से जुड़ना होगा
    धन्यवाद

    ReplyDelete

तेजी से भागते हुए कालचक्र में से आपके कुछ अनमोल पल चुराने के लिए क्षमा चाहता हूँ,
आपके इसी अनमोल पल को संजोकर मैं अपने विचारों और ब्लॉग में निखरता लाऊंगा।
आप सभी स्नेही स्वजन को अकेला कलम की तरफ से हार्दिक धन्यवाद !!

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