July 9, 2010

घाटी का मर्म

     घाटी का बवाल अभी शांत नहीं हुआ है। अमन बहाली के लिए सेना का फ्लैगमार्च जारी है। अलगाववादी ताकतें पकिस्तान के सह पर बवाल करने में कुछ हद तक कामयाब भी हुई हैं। इस बात को नाकारा नहीं जा सकता। घाटी में हो रहे इस बवाल का दोष हम वहाँ कि सरकार को नहीं दे सकते क्योंकि यह एक पूर्ण रूपेण सुनियोजित तथा सुनिश्चित दंगा है। वहाँ कि सरकार ने बहुत हद तक विकास के कार्य किये हैं पर वहाँ भी गरीबों कि कमी नहीं है। आज भी घाटी में कितने घर ऐसे हैं जिनको एक वक़्त के भोजन के लिए कई बार सोचना पड़ता है। ऐसे में कोई आकर उनको चार-पांच सौ रुपये देकर कहे कि तुम्हें सिर्फ पत्थर फेंकनें हैं तो वह ग़रीब सहर्ष इस ऑफर को स्वीकार कर लेगा। ग़रीबी उस आम इंसान को यह सोच पाने में विफल कर देती है कि जब वह पत्थर फेंकनें जायेगा तो शायद वापस भी ना आ सके  
      कश्मीर कि आम जनता कभी नहीं चाहती कि वहाँ कोई दंगा हो। वहाँ कि जनता शांति चाहती है। क्योंकि वहाँ कि जनता कई दशकों से इतने दंगे झेल चुकी है कि अब और दंगा बर्दास्त करने कि क्षमता नहीं बची है। वहाँ कि जनता को मज़हब के नाम पर भड़काकर तथा रुपयों का लालच देकर ज़बरन इस दंगे में धकेला जा रहा है। सरकार भी इस बात को अच्छी तरह जानती है। लेकिन घाटी में अमन बहाली के लिए सरकार सेना को आम जनता के पास ही भेजेगी। सेना का फ्लैगमार्च भी वहीँ होगा जहाँ घरों में चूल्हे नहीं जलते। दंगा फ़ैलाने वाले दिमाग़ सिर्फ 10 प्रतिशत ही हैं। लेकिन सारा नुकसान सारी परेशानी बेचारी ग़रीब जनता झेल रही है। जो 10 प्रतिशत लोग इस दंगे के कर्ता-धर्ता हैं उनको एक खरोंच भी नहीं आई होगी। ज़रा सोचिये वहाँ कि जनता कि ग़लती सिर्फ़ यही है कि वह आम जनता है। जिसका जन्म सिद्ध अधिकार सिर्फ़ दो पाटों के बीच में पिसना है   

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना। जनता बेचारी तो पिसती ही है।

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  2. दीप, फैज़ाबाद से,
    जनता की मज़बूरी ये है की जनता चाहे भी तो कुछ नहीं कर सकती।

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तेजी से भागते हुए कालचक्र में से आपके कुछ अनमोल पल चुराने के लिए क्षमा चाहता हूँ,
आपके इसी अनमोल पल को संजोकर मैं अपने विचारों और ब्लॉग में निखरता लाऊंगा।
आप सभी स्नेही स्वजन को अकेला कलम की तरफ से हार्दिक धन्यवाद !!

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